तारीखों में बंध गयी अब यारी-ऐ दोस्ती – Dosti Shayari

तारीखों में बंध गयी अब यारी-ऐ दोस्ती, रोज जताने की फुर्शत कहां रही
चंद नोटो को कमाने में मसरूफ़ हो गए अपने, हाल सुनने -सुनाने की जरूरत कहां रही
कागज के नोट सी हो गयी इजहार-ऐ दोस्ती,बिना मतलब निभाने की प्रीत कहां रही
जरूरत के हिसाब से बनने लगे अब दोस्त यहां
कृष्ण-सुदामा की यारी कहां रही
किस मोड़ पे कौन अपना अब बदल जाये
भरोसे के अहसास की वो डोरी कहां रही…….

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